जनजाति
छात्र-छात्राओं
के व्यावसायिक
अभिवृत्ति का एक
विश्लेषणात्मक
अध्ययन
लक्ष्मी
सोनेकर1, डाँ. नाजिया
आबिद खान2
1सहायक
प्राध्यापक, विवेकानंद
इस्ंिटट्यूट आॅफ
एजूकेशन, कोटा, रायपुर
(छ.ग.)
2सहा. प्राध्यापक, शिक्षा
अध्ययन शाला, मैट्स
विश्वविद्यालय
रायपुर (छ.ग.)
सारांश-
किसी भी राष्ट्र
समाज की समृद्धि
एवं वैभव संपन्नता
का मूलभूत आधार
शिक्षा का सर्वांगीण
विकास है, जो बालकों
में राष्ट्रीय
चरित्र एवं आदतों
का निर्माण करता
है। जितनी अच्छी
आदतें किसी राष्ट्र, समाज, व्यक्ति
व बालक में पाया
जाता है वह राष्ट्र-समाज
उतना ही अधिक चरित्रवान
माना जाता है।
बालकों की क्रियाशीलता
को उनकी अभिवृत्तियाँ
प्रभावित करती
हंै। अभिवृत्तियों
को सामान्यीकृत
आदतें अथवा विचार
अन्य आदतें भी
कहा जाता है, जो बालक
के व्यवहार एवं
चिंतन पर नियंत्रण
रखती है। अतः बालकों
की आदतें व अभिवृत्तियाँ
संयुक्त रूप से
अनेक चरित्र निर्माण
में योगदान देती
है।
शब्द कुंजी:
शिक्षा, व्यावसायिक
अभिवृत्ति, चरित्र
निर्माण।
प्ण् प्रस्तावना
प्राचीन भारत
में शिक्षा को
अधिक महत्त्व दिया
जाता था। इसका
एक प्रमाण यह है
कि शिक्षा को प्रकाश
का श्रोत, अंतर्दृष्टि, अन्तज्र्योति, ज्ञानचक्षु
और मनुष्य का तीसरा
नेत्र माना जाता
था। उस युग के भारतीयों
का विचार था कि
शिक्षा का प्रकाश
व्यक्ति के सब
संशयों का उन्मूलन
और उनकी सब बाधाओं
को नियंत्रित करता
है। शिक्षा व्यक्ति
को वास्तविक शक्ति
से सम्पन्न करती
है। उसके सुख-सुयश
एवं समृद्धि में
योग देती है, उसे जीवन
के यथार्थ महत्त्व
को समझने की क्षमता
प्रदान करती है
और उसे भव-सागर
को पार करके मोक्ष
प्राप्ति में सहायता
देती है।
शिक्षा के महत्त्व
के संबंध में ऊपर
अंकित और अनेक
अन्य धारणांएँ
व्यक्त करके भारतीयों
ने यह विश्वास
व्यक्त किया कि
शिक्षा कामधेेनु
या कल्पतरू के
समान व्यक्ति की
सब मनोंकामनाओं
को पूरा करती है।
उसके इसी विश्वास
के आधार पर डाॅ. ए. एस. अल्तेकर
ने अपना यह मत अक्षरबद्ध
किया है- ’’शिक्षा
को प्रकाश और शक्ति
का ऐसा श्रोत माना
जाता था, जो हमारी
शारीरिक, मानसिक, भौतिक
और आघ्यात्मिक
शक्तियों तथा क्षमताओं
का निरंतर एवं
सामंजस्य पूर्ण
विकास करके हमारे
स्वभाव को परिवर्तित
करती है और उसे
उत्कृष्ट बनाती
है’’।
विकास के दौर
में अतिशय जनसंख्या
की आवश्यकता के
अनुरूप परंपरागत
शिक्षा पद्धति
का स्वरूप भी परिवर्तित
होता रहा है। वर्तमान
समय में रोजगार
एक प्रमुख समस्या
के रूप में मानव
समाज के सम्मूख
उपस्थित है। आज
के समय मे आवश्यकता
के अनुरूप रोजगारोन्मूखी
होना चाहिए। इन्ही
उद्देश्यों की
पूर्ति के लिए
व्यावसायिक शिक्षा
का वर्तमान शिक्षा
पद्धति में समायोजन
किया गया है। व्यवसायिक
शिक्षा वह है जो
विद्यार्थियों
को आत्मनिर्भर
बनाती है तथा स्वरोजगार
को प्रोत्साहन
देती है। विश्व
की तेजी से बढ़ती
जनसंख्या केे कुल
स्वरूप उपजी बेरोजगारी
की विकराल समस्या
को देखते हुए व्यावसायिक
शिक्षा का विकास
किया जना आवश्यक
है। व्यवसायिक
शिक्षा और प्रशिक्षण
का उचित प्रकार
से योजनाबद्ध रूप
में बनाया गया
कार्यक्रम और उसका
प्रभावी कार्यान्वयन
शिक्षा को विकासात्मक
कार्यो के सांथ
जोड़ने की दिशा
में सबसे अधिक
उपयुक्त दृष्टिकोण
होगा। देश नये
व्यवसायिक भूमिकाओं
के लिए उपयुक्त
और शिक्षित व्यक्ति
तैयार करने के
योग्य होना चाहिए।
प्प्ण् अध्ययन
का उद्देश्य
प्रस्तुत
अध्ययन में समस्या
को ध्यान में रखते
हुए कुछ मुख्य
शोध संबंधी उद्ेश्य
निर्धारित किये
गये हैं जो निम्नलिखित
है-
1. उच्चतर
माध्यमिक विद्यालयों
में अध्ययनरत छात्र
छात्राओं में व्यवसायिक
अभिवृत्ति को ज्ञात
करना।
2. उच्चतर
माध्यमिक विद्यालयों
में अध्ययनरत छात्र
छात्राओं की सामाजिक
आर्थिक स्थिति
को ज्ञात करना।
प्प्प्ण्
शोध प्रविधि
प्रस्तुत
अध्ययन प्राथमिक
समंकों पर आधारित
है। जिसे व्यक्तिगत
साक्षात्कार अनुसूची
के माध्यम से एकत्रित
किया गया है। अनुसूची
से प्राप्त आंकड़ों
का विश्लेषण टी-परीक्षण
द्वारा किया गया
है।
प्टण् अध्ययन
का विश्लेषण
अ. शासकीय एवं
अशासकीय उच्चतर
माध्यमिक विद्यालयों
में अध्ययनरत छात्रों
के व्यावसायिक
अभिवृत्ति
टण् सुझाव
व्यावसायिक
अभिवृत्ति का मुख्य
उद्देश्य रही है
कि विद्यार्थी
$2 स्तर
की व्यवसायिक शिक्षा
प्राप्त कर अपना
स्वयं का व्यवसाय
कर सके इसमें एक
ओर जहाॅ विद्यार्थी
की निराशा दूर
होती है, वही दूसरी
ओर उच्च शिक्षण
संस्थाओं में आवश्यक
भीड़ भी कम होगी
और अपने आप में
बहुत सारी समस्याओं
का समाधान हो जायेगा।
व्यवसायिक शिक्षा
ही एक ऐसी शिक्षा
है, जो छात्रों
के हतासा एवं निराशा
को दूर करने में
सहायक सिद्ध हो
सकती है।
व्यावसायिक
अभिवृत्ति देश
की वर्तमान परिस्थिति
में एक अनिवार्यता
है तथा इसकी योजना
देशकाल को दृष्टि
में रखकर ही बनाई
जानी चाहिए। एक
विकासशील राष्ट्र
को विकसित अवस्था
में पहॅुचाने के
लिए नागरिकों में
अभिवृत्ति जागृत
कर व्यवसायिक शिक्षा
की ओर आकृष्ट करना
चाहिए। वर्तमान
में शासन द्वारा
व्यावसायिक शिक्षा
का संचालन कुछ
गिने चुने संस्थाओं
में चलाया जा रहा
है, जिसका लाभ
सभी नही उठा पते।
कई प्रकार की समस्याएं
हैं, इन समस्याओं
के सही हल एवं कुशल
संचालन के लिए
शोधकर्ता द्वारा
निम्नलिखित सुझाव
दिऐ जाते है-
ऽ व्यावसायिक
शिक्षा का संचालन
करने के साथ साथ
विद्यार्थियों
में अभिवृत्ति
को जागृत करना
चाहिए।
ऽ व्यावसायिक
पाठ्यक्रम के प्रायोगिक
एवं व्यावहारिक
पक्ष पर अधिक बल
दिया जाना चाहिए।
ऽ व्यावसायिक
शिक्षा का संचालन
$2 स्तर
की समस्त विद्यालयों
में करना प्रारंभ
की जानी चाहिए।
ऽ व्यावसायिक
शिक्षा के महत्व
की जानकारी नगर
के पालकों एवं
अभिभावकों तक पहुचना
चाहिए।
ऽ पाठ्यक्रम
विषय के बोझ से
इतने लदे हैं नए
विषयों का समावेश
सरलता से संम्भव
नही है, जिसे
संम्भव करना चाहिए।
ऽ व्यावसायिक
सूचना के अध्यापन
करने के लिए योग्य
शिक्षकों का होना
अनिवार्य किया
जाना चाहिए।
ऽ व्यावसायिक
सूचना सेवा विद्यालय
के अध्यापक पाठ्य
विषयों के माध्यम
से प्रदान कर सकते
हंै।
ऽ कभी कभी
व्यवसाय में काम
करने वाले कार्यकर्ता
के अनुभव से भी
छात्रों को लाभान्वित
कराया जाना चाहिए।
ऽ अध्यापक
वाद-विवाद प्रतियोगिता
द्वारा विभिन्न
व्यवसायों के गुणों
तथा अवगुणों की
तुलनात्मक समीक्षा
करके लाभ पहुॅचा
सकते हैं।
ऽ विद्यालय
के बाहर अंशकालिन
विद्यालयों, कालोपरांत
तथा ग्रीष्मकालीन
सेवाओं के माध्यम
से विद्यार्थियों
में व्यवसाय के
प्रति जागरूकता
उत्पन्न कर सकते
हैं।
संदर्भ
पाठक, पी. डी., शिक्षा
मनोविज्ञान - आगरा
1992.
राय. पारसनाथ, अनुशंधान
परिचय 1985.
डाॅ. आस्थाना
बिपिन, शैक्षिक
मापन एवं मूल्यंाकन
डाॅ. दुबे
रमाकान्त, शैक्षिक
एवं व्यवसायिक
निर्देशन के आधार
2002.
Received on 08.01.2014 Modified on 18.02.2014
Accepted on 09.03.2014 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Rev. & Res. Social Sci. 2(1): Jan. – Mar. 2014; Page 43-47